संस्कार Sanskar

April 27th, 2020 by Jashodhara Purkayastha

यह कहानी थोड़े दिन पहले की हैं।तब कोरोना को कई भी नही जानते थे।सब लोग खुशी से दिन बिता रहे थे। मैं बालकॉनी में खड़ी थी। मुझे बालकॉनी में खड़े होने में बहुत आनंद आता हैं। मैं आदत से मजबूर, कई न कई गाना तो गुनगुनाती हु ई । उसदिन भी मैं “द्वार खोलकर बैठा हु ,तुम आ जा न भगवान, तेरे बिना मन मंदिर मेरा ,है पड़ा सुनसान–— रीत पूजा की याद नहीं हैं,क्या चढ़ाऊँ प्रसाद नहीं हैं तुम हो दाता,मैं हु भिखारी, क्या दियु मैं बलिदान —
उतना गातेहि देखती हु दो बच्चे हाथ में कुछ लेकर धीरे धीरे जा रहे थे। एक लड़का पायजामा और कुर्ते में और लड़की ने एक सुन्दरबसी फ्रॉक पहनकर जा रहे थे। हाथ में क्या हैं,वो स्पष्टरूप से दिखाई न दिया। भागकर अंदर आयी और ऐनक लगाकर देखने गयी। देखती हु दानों के हाथों में एक एक गुच्छे अंगूर हैं। बच्चे को देखकर मन बड़ा प्रश्फुलित हो गया। सोचने लगी,हाथ में अंगूर लेकर ये दोनों कंहा जा रहे हैं। दूर तक जँहा रास्ता शेष होता, वहां तक देखने लगी। बाद में घर के भीतर आते ही पति ने कहा “आज भी बच्चे ‘! लेकिन बच्चे तो अदृश्य हो गये। एक हफ्ताह के बाद फिर से बालकॉनी से देखती हु वे दो बच्चे। दूर चले गए। फिर भी पहचान लिया। बिल्डिंग के सामने आतेही मैंने जोर जोर से बुलाई — “बच्चे ,बच्चे ! आपलोग हाथ में फल लेकर कहाँ जाते हो ? “हम तो प्रतिदिन सुबह कोई न कोई फल लेकर रास्ते के उसपार जाते हैं। रास्ते में एक बाबा है ! “मतलब भिखारी”? “हम उनको बाबा ही कहते हैं। हमारी मम्मी ने बाबा कहने के लिए सिखाया। हम सुबह उनको फल देते हैं ।मम्मी दोपोहर को खिचड़ी और पापड़ देती हैं। “हर रोज तुम्हारे घर में खिचड़ी ही बनती हैं “? “नहीं कभी तो रोटी सब्जी भी बनता हैं। लेकिन बाबा को तो दाँत नही हैं, इसीलिए मम्मी उनके लिए खिचड़ी बनाती हैं”। सुनकर मन प्रसन्न हो गया और बच्चे की मम्मी के बारे में सोचने लगी। इतने अच्छे सेवाधारी और संस्कारी परिवार है। रोज की तरह,उसदिन भी मैं बालकॉनी में खड़ी थी । देखती हु,वही दो बच्चे और उनकी मम्मी व्यस्त होकर ,भागकर, दौड़कर जा रहे हैं। मैंने सोचा यह समय ठीक नही होगा उनको टोकने के लिए। मनमे सोची जब कभी देखूंगी ,तब पूछ लूँगी।यह सोचकर अंदर आ गयी। सोचने लगी, शायद बस पकड़ने के लिए भाग रहे थे या बच्चे की गाड़ी छूट गयी । न: न: ,बच्चे तो यूनिफार्म में नही थे। और उनके हाथ में भी सूटकेस भी नहीं थे। यह सोचते सोचते मैं मेरी दैनिक कामों में लग गयी। दो दिन बाद ,जब मैं बालकॉनी में खड़ी हुई, देखती हु वही परिवार।।आज चारजन। अंदाज से सोच लिया,शायद यह आदमी बच्चे के पिता हैं। बिल्डिंग के सामने आतेही मैंने बुलाया “बच्चे!बच्चे ! ऊपर देखतेही मैन पूछा “उसदिन कार्यरत होकर कहाँ जा रहे थे”? माँ ने उत्तर दिया,” रास्ते के उसपार एक बाबा बैठता था। हम और हमारे बच्चे रोज उनको खाना देते थे । उसदिन उनका तबीयत अचानक खराब हो गए। नजदीकी दूकान से फ़ोन आया । हैम दौड़कर वहां जाकर एम्बुलेंस बुलाया और उन्हें हस्पताल में दाखिल कर दिया। दाखिल करके हम घर आ गए। आज सुबह से हम वहां पर थे। लेकिन आज बारह बजे वह बाबा गुजर गए। हमलोग वहां से ही आ रहे थे। “उनका आत्मा को भगवान सतगति दे” यह मुँह से निकल गए। नमस्कार कर भीतर आकर मैंने सोचने लगी,”अजनबी भिखारी को बाबा बुलानेवाले लोग भी हैं दुनियामें।खाना देनेवाले भी हैं। यह दुनिया में भगवान जब किसीको भेजता है,तो उसके साथ खाने के हिस्से के साथ ही पृथ्वी पर भेजते हैं । सेवाधारी भी यह दुनिया में कम नही हैं। सेवा ही परम धर्म हैं। यशोधरा पुरकायस्थ

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